प्रतिबंध के बावजूद भी जोरों पर मछली शिकार: मत्स्य विभाग की निष्क्रियता उजागर


जांजगीर-चांपा। जिले के चांपा नगर के आसपास के क्षेत्रों में मत्स्य विभाग की लापरवाही के कारण प्रतिबंधित अवधि में भी नदी, नालों और तालाबों में मछली पकड़ने का कार्य धड़ल्ले से जारी है। खासकर हसदेव नदी के तटवर्ती इलाकों में मछली शिकार करने वाले लोग खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, लेकिन विभागीय अमला पूरी तरह से मौन है।हर वर्ष मानसून के समय मछलियों के प्रजनन को ध्यान में रखते हुए राज्य शासन द्वारा जून से अगस्त तक मछली पकड़ने पर सख्त प्रतिबंध लगाया जाता है। इस दौरान न केवल मछली पकड़ने पर रोक होती है, बल्कि मछली पालन और विक्रय पर भी नियंत्रण रखा जाता है, जिससे मछलियों की प्रजातियां संरक्षित रह सकें और जलजीव संतुलन बना रहे। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है।हसदेव नदी, लीलागर, कोतमी, बेलटुकरी सहित चांपा क्षेत्र के अनेक जल स्रोतों में बिना किसी डर के मछली पकड़ने का कार्य जारी है। मछुआरे जाल और करंट जैसे खतरनाक साधनों का प्रयोग कर रहे हैं, जिससे न केवल मछलियां बल्कि अन्य जलीय जीव भी प्रभावित हो रहे हैं। इतना ही नहीं, स्थानीय बाजारों में ताजे पानी की मछलियां खुलेआम बिक रही हैं, जिससे साफ होता है कि यह कार्य बड़े स्तर पर संगठित तरीके से संचालित हो रहा है। विभाग की यह निष्क्रियता न केवल मछलियों की प्रजातियों के लिए खतरा बन रही है, बल्कि जैविक पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित कर रही है। वहीं कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि विभाग के कुछ कर्मचारी मौन सहमति के साथ इन गतिविधियों को नजरअंदाज कर रहे हैं।इस पूरे मामले में अब प्रशासनिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले वर्षों में मछली उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। शासन को चाहिए कि वह मत्स्य विभाग को सक्रिय कर, संयुक्त दल बनाकर नदी और तालाबों की निगरानी करे और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा हो सके और मछलीपालन का भविष्य सुरक्षित रह सके।